शेखचिल्ली के ख्याली पुलाव
शेखचिल्ली के ख्याली पुलाव एक दिन शेखचिल्ली की कम्मी ने उससे कहा बेटे अब तुम जवान हो गए हो अब तुम्हें कुछ काम घंघा करना चाहिए क्या करु कोई भी काम करो लेकिन मुझे तो कोई काम अआता हीनहीं फिर मुझे कौन काम पर रखेगा कुछ न कुछ तो करना ही पडे़गा बेटे तू खुद ही सोच कि मेराबुढा़ शरीर कब तक तेरा बोझ उठाता रहेगा आप ऐसा कहती हौं तो ठीक है मै काम की तलाश में चला जाता हूं आप बढिंया सा भोजन बनाइए मैं खा पीकर चला जाऊंगा अभी बना देता हू शखचिल्ली की अम्मी ने उनके लिए बढ़िया बढ़िया पकवान बनाये और खिला पिलाकर उन्हें नौर कोई बात नहों थी वह मस्ती में झुमते हुए घर से बाहर निकल पड़े उनके दिमाग में नौकरी और मजदूरी के सिवा और कोई बात नहीं थी रास्ता में उन्हें एक वयकित मिला जो अण्डें का झाबा सिर पर लिए परेशान हो रहा था बोझ के मारे उसके कदम लड़खड़ा रहे थे उसने शेख के देखते ही कहा ऐ भाई मजदूरी शेखचिल्ली बिल्कुल करूंगा बनदा तो मजदूरी की तलाश में हो हौ तो मेरा यह झाबा ले चलो इसमें अण्डे हौ टुट न जाएं तुम इसे मेरे घर तक पहुंचा ...